भारत के नक्शे पर हरियाणा प्रदेश का उदय



 1940 से 1960 का दशक वो दौर था जब संयुक्त पंजाब को विभाजित करने के लिए पंजाब के नेता बहुत बढ़चढकर आंदोलन कर रहे थे। भाषाई और सांस्कृतिक पहचान के लिए उन्होंने अलग पंजाबी सूबा बनाने के लिए आंदोलन छेड़ा। उसी दौर में आज के हरियाणा प्रदेश के इलाके के नेता अपने इलाके की चिंता में थे कि उपक्षेत और तिरस्कृत इस इलाके का उद्धार कैसे हो। 

1955 में पंजाब के अकाली दल ने जोरदार मांग उठाई कि भाषाई आधार पर अलग पंजाबी सूबा बनाया जाए जिस से पंजाबी भाषी लोगों का अपना भाषाई और सांस्कृतिक विकास सुनिश्चित हो। 

तत्कालीन वरिष्ठ अकाली नेता मास्टर तारा सिंह ने "पंजाबी सूबा जिंदाबाद" का नारे देकर आवाज को बुलंद किया उन्होंने जनसभाएं की मांगपत्र सौंपे, जिसके कारण एक तरफ जहां हरियाणा के गैर पंजाबी इलाके में असंतोष और अनिश्चिता और बढ़ गई। 1960 में जनगणना में पंजाबी भाषी क्षेत्रों में मास्टर तारा सिंह और संत फतह सिंह के जबरदस्त हस्तक्षेप से 

क्योंकि पंजाबी और सिक्ख बहुल राजनीति के चलते हरियाणा के जिले, शहर और गांव पहले उपेक्षित से थे राजनीतिक प्रतिनिधत्व की कमी अलग थी। 

हरियाणा क्षेत्र में मुख्यतः हरियाणवी (बोली), हिंदी और ब्रज भाषा की छाया रही है, जबकि संयुक्त पंजाब का प्रशासनिक ढांचा पंजाबी भाषा और गुरमुखी लिपि की ओर झुका हुआ था। जिसके कारण प्रशासन और शिक्षा की प्रमुख भाषा बनाए जाने के कारण एक असंतोष बढ़ा। 

हरियाणा क्षेत्र कृषि-प्रधान था लेकिन यहां सिंचाई, सड़कों और उद्योग के लिए कम निवेश होता था।

लुधियाना, अमृतसर, जालंधर जैसे इलाके औद्योगीकरण में आगे बढ़ते गए, जबकि रोहतक, भिवानी, रेवाड़ी, आदि इलाकों में विकास धीमा रहा। नहरें व सिंचाई परियोजनाएं मुख्यतः सतलुज घाटी पर केंद्रित थीं — जिससे दक्षिण-पूर्व पंजाब (आज का हरियाणा) सूखा-प्रवण रहा।

चंडीगढ़, लुधियाना, जालंधर आदि प्रशासनिक केंद्र हरियाणा के भूगोल से दूर थे।हरियाणा के लोगों को लगता था कि उनकी भाषा, संस्कृति, पहनावा, लोकगीत, रीति-रिवाज — पंजाब के मूल भाग से भिन्न हैं, इसलिए एक अलग पहचान होनी चाहिए।

हरियाणवी बोली, देहाती परंपराएँ, और स्वतंत्र जीवनशैली को 'पिछड़ा' समझा जाता था। 

1965 में अकाली नेता संत फतह सिंह ने आत्मदाह की धमकी देकर आंदोलन तेज किया। 

जहां पंजाबी सूबे की मांग अकाली नेताओं की थी वहीं हरियाणा प्रांत की मांग तत्कालीन कांग्रेस नेताओं मुख्यतः चौधरी देवीलाल और राव बीरेंद्र सिंह की तरफ से उठने लगी। 

इस इलाके के साथ होने वाले राजनीतिक पक्षपात और सुविधाओं की कमियों के कारण आंदोलन बढ़ता गया जिसमें आग में घी का काम हिंदी आंदोलन ने किया। चौधरी देवीलाल की ग्रामीण क्षेत्रों में पैठ ने आंदोलन को मजबूती प्रदान की और  अंततः फजल अली रिपोर्ट के आधार पर 1 नवंबर, 1966 को हरियाणा प्रदेश पंजाब से अलग पृथक राज्य बना। 

इस राज्य विभाजन के अग्रणी जहां पंजाब इलाके से मास्टर तारा सिंह, संत फतह सिंह, गुरनाम सिंह, प्रकाश सिंह बादल, ग्यानि करतार सिंह जैसे प्रमुख अकाली नेता थे वहीं हरियाणा के इलाके से चौधरी देवीलाल, राव बीरेंद्र सिंह, चौधरी रघुबीर सिंह झज्जर से, चौधरी सुभाष चंद्र रोहतक से, लाला रणबीर करनाल, मिर्ज़ा मुंतजिर बेग,(मेवात) गुड़गाम, चौधरी छात्र सिंह जींद से प्रमुख व्यक्ति थे और ये अधिकतर तत्कालीन कांग्रेसी नेता ही थे।

भले ही आज कुछ लोग हरियाणा के पंजाब से विभाजन को गलत मानते हैं लेकिन तत्कालीन असंतोष और समानताएं बहुत बड़ा कारण थे अलग राज्य बनने का जिसका दूरगामी प्रभाव हरियाणा के लिए अच्छा ही रहा आज हरियाणा कई मायनों में पंजाब से कहीं आगे है।

1857 के अंग्रेजों के खिलाफ उठे सामाजिक और राजनैतिक विद्रोह के बाद आज के हरियाणा के अधिकतर जिले पंजाब में मिला दिए गए थे। जो इस 1857 से पूर्व इस प्रकार विभाजित थे रोहतक, सोनीपत दिल्ली सूबे और  नवाबी जागीरों में बंटा था, हिसार, सिरसा लगभग सीधा अंग्रेजों के अधीन ही रहा करनाल, पानीपत सहारनपुर/दिल्ली सूबा में रहे, गुरुग्राम, रेवाड़ी राव तुलाराम के अधीन, दिल्ली सूबा, महेन्द्रगढ़, नारनौल जयपुर-पटियाला संघर्ष क्षेत्र रहा।

गौरतलब है कि आज के पंजाब का क्षेत्र ईस्ट इंडिया कंपनी के सीधे नियंत्रण में था जिसका बॉस लार्ड डलहौजी को बनाया गया था।

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